दीवाली ख़ुशियों का पर्व है, लेकिन इस मौसम में अस्थमा की समस्या बढ़ जाती है। पटाखों के कारण वातावरण में उत्पन्न धुँआ दमा रोग से जूझते व्यक्तियों के लिए बेहद ख़तरनाक होता है और वातावरण में विषैली गैसों के कारण इन्हें साँस लेने में तक़लीफ़ होने लगती हैं। ऐसे में इन रोगियों को अपनी उचित देखभाल करना चाहिए। सबसे पहले यह जान लें कि दमा रोग या अस्थमा की बीमारी क्या है? दमा रोग का इलाज घरेलू उपाय से कैसे कर सकते हैं?

जब किसी व्यक्ति की सूक्ष्म श्वास नलियों में कोई रोग उत्पन्न हो जाता है तो उस व्यक्ति को साँस लेने में परेशानी होने लगती है। जिसके कारण उसे खाँसी होने लगती है। इस स्थिति को दमा रोग कहते हैं।

दमा रोग का इलाज

दमा रोग के लक्षण

दमा रोग के लक्षण जानना बेहद ज़रूरी है। इस बीमारी में रोगी को सांस लेने तथा सांस छोड़ने में काफ़ी ज़ोर लगाना पड़ता है। जब मनुष्य के शरीर में पाये जाने वाले फेफड़ों की नलियों (जो वायु का बहाव करती है) की छोटी छोटी तंतुओं में अकड़न युक्त संकुचन उत्पन्न होता है तो फेफड़ा वायु (साँस) की पूरी खुराक को पचा नहीं पाता है। जिसके कारण रोगी व्यक्ति को पूर्ण श्वास खींचे बिना ही श्वास छोड़ देने को मजबूर होना पड़ता है, इस अवस्था को दमा या श्वास रोग कहा जाता है।

अस्थमा की बीमारी तब अधिक बिगड़ जाती है, जब रोगी साँस के द्वारा जब वायु फेफड़े के अंदर ले जाता है, लेकिन साँस अंदर खींचने में कठिनाई होने के साथ-साथ साँस बाहर छोड़ने में अधिक समय लगता है। दमा रोग से परेशान व्यक्ति को साँस लेते समय हल्की हल्की सीटी बजने की आवाज़ भी सुनायी पड़ती है।

जब यह परेशानी बढ़ जाती है तो उसे दौरा आने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। रोगी व्यक्ति छटपटाने लगता है। जब दौरा अधिक क्रियाशील होता है तो शरीर में ऑक्सीजन के अभाव के कारण रोगी का चेहरा नीला पड़ जाता है। यह रोग स्त्री और पुरुष दोनों को हो सकता है। जब दमा रोग का दौरा पड़ता है तो उसे सूखी और ऐठनदार खाँसी होती है। इस रोग से ग्रस्त रोगी चाहे कितना भी बलगम निकालने के लिए कोशिश करे लेकिन फिर भी बलगम बाहर नहीं निकलता है। अस्थमा के रोगियों को रात के समय, ख़ासकर सोते हुए, ज़्यादा कठिनाई महसूस होती है।

दमा रोग से पीड़ित लड़की

दमा रोग होने का कारण

  1. खान पान के ग़लत तरीक़े
  2. मानसिक तनाव, क्रोध तथा अधिक भय
  3. ख़ून में किसी भी प्रकार का दोष उत्पन्न हो जाने के कारण
  4. नशीले पदार्थो का अधिक सेवन
  5. खाँसी, जुकाम तथा नजला रोग अधिक समय तक रहना

दमा रोग में सावधानियाँ

  1. भोजन में मिर्च मसाले वाले भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।
  2. धूल और धुँए वाले वातावरण से दूर रहना चाहिए क्योंकि ऐसे वातावरण में रोग बढ़ने की सम्भावना बढ़ जाती है।
  3. मानसिक तनाव व लड़ाई झगड़े से भी बचना चाहिए।
  4. अस्थमा रोग के बारे में अपने और अपने परिवार की जानकारी बढ़ायें, ताकि अच्छी तरह से इसे कंट्रोल कर सके।
  5. घर में अच्छे से सफाई रखें। तकिये के कवर, चादर जिन पर सबसे ज़्यादा धूल कण बैठ जाते है और व्यक्ति के संपर्क में भी सबसे ज़्यादा आते हैं, इसलिए इन्हें बदलते रहें और सफ़ाई का विशेष ध्यान रखें।

दमा रोग के घरेलू उपचार

  1. प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी प्रतिदिन नींबू व शहद मिलाकर पिए। इसके बाद एक सप्ताह तक फलों का रस, हरी सब्ज़ियों का रस तथा सूप पीकर उपवास रखें। इसके बाद साधारण भोजन करना चाहिए।
  2. भोजन में सुबह तुलसी और अदरक की चाय या सब्ज़ी का सूप, दोपहर में सादी रोटी व हरी सब्ज़ी, गरम दाल व तीसरे पहर सूप या देशी चाय, रात्रि में सादे तरीक़े से बनी मिश्रित हरी सब्ज़ियों का सेवन करें।
  3.  रात में जल्दी भोजन करके सोना चाहिए तथा सोने से पहले गरम पानी को पीकर सोना चाहिए। अजवाइन के पानी की भाप लेनी चाहिए। इससे दमा रोग का इलाज संभव है।
  4. जल्दी घबराना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करने से दौरे की तीव्रता बढ़ सकती है।
  5. रोगी को सप्ताह में 2 से 3 बार सुबह के समय में कुल्ला दातुन करना चाहिए। इसके बाद लगभग 1 लीटर पानी में 15 ग्राम सेंधा नमक मिलाकर धीरे धीरे पीकर फिर गले में उँगली डालकर उल्टी कर देनी चाहिए। इससे आराम मिलता है।
  6. अस्थमा की बीमारी में गरम बिस्तर पर सोना चाहिए।

अस्थमा रोग से पीड़ित बूढ़ा व्यक्ति

उचित आहार और खानपान

  1. दमा रोग का इलाज करने में एंटी-ऑक्सीडेंट वाली चीजें खानी चाहिए। एंटी-ऑक्सीडेंट सीधा फेफड़ों में जाकर फेफड़े की बीमारियों से और साँस की बीमारियों से लड़ता है और जिन खाद्य पदार्थों में विटामिन ई और सी होता है, वे सूजन कम करते हैं।
  2. साइट्रस फ़ूड जैसे संतरे का जूस, हरी गोभी में विटामिन सी की मात्रा अधिक पाई जाती है। ये अस्थमा के मरीजों के लिए बहुत लाभप्रद हैं।
  3. ऐसे फल व सब्ज़ियाँ जो गहरे रंग की होती हैं। उनमें बीटा कैरोटीन की मात्रा अधिक होती है जैसे गाजर, पालक आदि। फल व सब्ज़ियों का रंग जितना गहरा होता है उनमें एंटी-ऑक्सीडेंट की मात्रा उतनी ही अधिक होती है।
  4. कच्चे प्याज में सल्फ़र अधिक रहती है जो अस्थमा के रोगी के लिए लाभप्रद है।
  5. तुलसी के पत्ते अच्छे से साफ़ कर इसे कालीमिर्च के साथ सेवन करने से दमा को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

आशा है कि आप इस जानकारी को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाकर, समाज में इसके प्रति चेतना लाने में सफल होंगे।

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