कलश स्थापना और माँ दुर्गा की चौकी की स्थापना विधि

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नवरात्र साल में दो बार पड़ते हैं। जिनका बहुत अधिक महत्व है। यह भक्तों की आस्था और विश्वास को मजबूत बनाते हैं। माँ भगवती की कृपा और उनका स्नेह पाने के लिए भक्त जन श्रद्धा और विश्वास के साथ माता के व्रत रखते हैं। कलश स्थापना या घट की स्थापना और माता की चौकी की स्थापना कर पूजा अर्चना करते हैं। फिर 9 दिनों तक भक्ति भाव से उनका ध्यान, आवाह्न और आराधना करते हैं।

इस बार नवरात्र 1 अक्टूबर 2016 को पड़ रही है। इसमें सभी लोग प्रतिदिन जल्दी स्नान करते हैं। फिर नवरात्रि के पहले दिन पूजा अर्चना करते समय सर्वप्रथम कलश / घट की स्थापना करते हैं। ऐसा माना जाता है कि कलश सुख समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक है। जो जीवन में आने वाले कई विघ्नों को हर लेता है और जीवन को खुशियां और समृद्धि से भर देता है। क्योंकि कलश के मुख में विष्णुजी का निवास, कंठ में रुद्र तथा मूल में ब्रह्मा स्थित हैं और कलश के मध्य में दैवीय मातृशक्तियां निवास करती हैं। इसीलिए जो भी भक्त सच्चे मन से माँ के घट की स्थापना करते है उस पर माता की असीम अनुकम्पा बरसती है और जीवन में दुःख तकलीफ उसे कभी छू भी नहीं पाते हैं।

कलश स्थापना की सामग्री

कलश स्थापना के लिए एक मिट्टी का कलश हो जो छेद रहित होना चाहिए। उस कलश के मुंह को बन्द करने के लिए एक मिट्टी का पात्र हो, कलश रखने के लिए भी एक बड़ा मिट्टी का पात्र हो, साफ और शुध्द थोड़ी मिट्टी हो, जौ हो, कलश में भरने के लिए गंगाजल, मौली / कलावा, साबुत सुपारी, दूर्वा, कलश में रखने के लिए कुछ सिक्के, पंचरत्न, चावल / अक्षत, आम के 5 पत्ते, पानी वाला नारियल, नारियल पर लपेटने के लिए लाल कपडा या चुनरी, फूल और फूलों की माला, गाय का गोबर और मिठाई ।

घट स्थापना की विधि

सबसे पहले कलश के बाहर एक पतली लाइन की तरह गाय के गोबर की एक लाइन बनाएं। फिर इस पर चुन चुन कर माँ भगवती का ध्यान करते हुए जौ लगाएं। अब कलश को जिस मिट्टी के पात्र में रखेंगे। इस पात्र में मिट्टी की एक परत बिछाएं। फिर जौ की एक परत बिछाएं। इसके ऊपर फिर एक परत मिट्टी की बिछाएं और फिर एक परत जौ की बिछाएं। अब कलश के कंठ पर मोली / कलावा बाँध कर इसी जौ मिट्टी के पात्र के ऊपर रख दें। अब कलश में गंगाजल भर दें। फिर दूर्वा और फूल डालें। अब कलश में पंचरत्न और कुछ सिक्के रख दें। कलश के कंठ के चारों तरह एक एक करके आम के पांच पत्ते को रखें और फिर मिट्टी के पात्र या ढक्कन से बंद कर दें। अब ढक्कन वाले पात्र में चावल भर दें। अब नारियल पर लाल कपडा या चुनरी लपेट कर मोली / कलावा लपेट दें और इसे कलश पर रखें। शास्त्रों में यह उल्लेख मिलता है: “अधोमुखं शत्रु विवर्धनाय, ऊर्ध्वस्य वस्त्रं बहुरोग वृध्यै। प्राचीमुखं वित विनाशनाय, तस्तमात् शुभं संमुख्यं नारीकेलं”। अर्थात् अगर कलश स्थापना में नारियल का मुख नीचे की तरफ होगा तो शत्रु में वृद्धि होती है। अगर नारियल का मुख ऊपर की तरफ रखें तो रोग बढ़ते हैं, जबकि पूर्व की तरफ नारियल का मुख रखने से धन का विनाश होता है। इसलिए नारियल की स्थापना करते समय सदैव नारियल का मुख साधक की तरफ रहे।

कलश स्थापना के बाद भक्त माँ भगवती का ध्यान करें और यह प्राथर्ना करें कि इन नौ दिनों के लिए माँ भगवती हमारे घर में पधारें और अपनी असीम अनुकम्पा हम पर बनाए रखें। अब कलश के पास दीपक जलाकर कलश का पूजन करें। फिर धूपबत्ती कलश को दिखाएं। कलश को माला अर्पित करें। कलश को फल मिठाई अर्पित करें।

घट स्थापना के बाद माँ दुर्गा की चौकी स्थापित करने का विधान

घट / कलश स्थापना के बाद माँ दुर्गा की चौकी स्थापित की जाती है। इसके लिए नवरात्र के पहले दिन एक लकड़ी की चौकी को गंगाजल से पवित्र करें। इसके ऊपर लाल वस्त्र बिछाएं। इस चौकी को कलश के दायीं ओर रखें। उसके बाद माँ भगवती की मूर्ति अथवा फोटो को इस चौकी पर स्थापित करें। अब माँ दुर्गा को लाल चुनरी चढ़ाएं। फूलों की माला पहनाएं। एक दीपक जलाएं, जो भक्त नवरात्री में माता के 9 दिन उपवास रखते हैं। उन्हें पहले दिन ही अखंड ज्योत जलानी चाहिए। जो नौ दिन तक लगातार जलती रहती है। अब मिठाई अर्पित कर हाथ जोड़कर माँ दुर्गा से प्रार्थना करें “हे माँ दुर्गा आप नौ दिन के लिए इस चौकी में विराजमान होकर हमारी पूजा को स्वीकार करें।

प्रतिदिन प्रातः काल स्नान करने के बाद 9 दिनों तक माँ भगवती के 9 स्वरुप जैसे श्री शैलपुत्री, श्री ब्रह्मचारिणी, श्री चंद्रघंटा, श्री कुष्मांडा, श्री स्कंदमाता, श्री कात्यायनी, श्री कालरात्रि, श्री महागौरी, श्री सिद्धिदात्री की स्तुति और पूजा अर्चना करते हैं। जिसमें नित्य दोनों पहर निम्न मंत्रों का उच्चारण अवश्य करें-

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।
ॐ जयन्ती मङ्गलाकाली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः
या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

फिर दोनों पहर दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए। जो भक्त नित्य दुर्गा सप्तशती का पाठ करता है उसकी हर एक मनोकामना पूरी होती है और उसे सभी कष्टों से छुटकारा मिलता है।

नवरात्रि के प्रतिदिन माता रानी को फूलों का हार चढ़ाए। प्रतिदिन घी का दीपक जलाकर माँ भगवती को मीठे का भोग लगाना चाहिए।

इसके बाद अष्टमी या नवमी वाले दिन व्रत का समापन करने के लिए हवन करते हैं और फिर छोटी छोटी 5 या 7 या 9 कन्याओं का विशेष पूजन किया जाता है और उन्हें कुछ न कुछ भेंट भी दी जाती है।

इस विधि विधान से नवरात्रि में 9 दिनों तक माँ की पूजा अर्चना करें और माता रानी की कृपा सदैव उनके भक्तों पर बनी रहें।

जय माता दी।

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