बूंदी का रायता

आंखों से आंसू बहने का रहस्य

आप भी कभी न कभी रोएँ होंगे और आपने बहुतों को रोते भी देखा होगा। लेकिन क्या आपको पता है कि आप रोते क्यों हैं? अक्सर देखा जाता है कि कुछ लोग ज़रा सी बात पर रोने लगते हैं, तो कोई बात करते समय रोने लगते हैं, तो कुछ फ़िल्म के भावुक सीन देखकर आंसू बहाने लगते हैं; रोने की कोई भी वजह हो लेकिन उनको रोना आता है। क्या आप ख़ुद भी ऐसे लोगों में हैं, जो किसी बात से रोने लगते हैं। कभी आपने सोचा है कि आंखों से आंसू बहने के पीछे का वैज्ञानिक कारण क्या है?
आंखों से आंसू बहने का रहस्य

आंखों से आंसू बहने का कारण

आपने अक्सर महसूस किया होगा कि फ़िल्मों में कई ऐसे भावुक कर देने वाले सीन होते हैं, जिनको देखने के बाद हमारी आंखें भर आती हैं और आंखों से आंसू बहने लगते हैं। जिन्हें चाहकर भी हम कंट्रोल नहीं कर पाते हैं। मेरे साथ भी ऐसा होता है और शायद आपके साथ भी। बहुत सी फ़िल्मों में कलाकार ऐसे भूमिका निभाते हैं जिससे लगता है कि वो वो नहीं हम हैं और सब कुछ हमारे से बीत रहा है, और हम भावुक होकर रो पड़ते हैं।
हमारे समाज में महिलाओं के रोने पर ज़्यादा गौर नहीं किया जाता है लेकिन यदि कोई पुरुष ऐसा करे तो इस बात को बहुत बुरा समझ जाता है। ऐसे पुरुषों को आंतरिक रूप से कमज़ोर मान लिया जाता है। लेकिन ये कोई कमज़ोरी नहीं है, ज़रूरत है आपको इसके पीछे का वैज्ञानिक तर्क जानने की।
क्या हम इंसान ही रोते हैं या पशु पक्षी भी ऐसा करते हैं? अगर हम रोते हैं तो आखिर इसका कोई फ़ायदा है, या ये सब यूँ बेमानी है?

मनोवैज्ञानिक विलियम फ़्रे का शोध

बहुत से तजरिबों से एक बात जो सामने निकलकर आती है वो ये है कि महिलाएँ पुरुषों की तुलना में जल्दी रो पड़ती हैं। मनोवैज्ञानिक विलियम फ़्रे के 1982 में किए गए एक शोध से पता चला कि पांच महीने महिलाएँ कम से कम पांच बार रोती हैं वहीं पुरुष डेढ़ बार से भी कम रोते हैं। जहाँ महिला का क्रंदन 5 से 6 मिनट का होता है वहीं पुरुष का रुदन मात्र दो मिनट के आस पास होता है।

मनोवैज्ञानिक एड विंगरहोएट्स का शोध

हॉलैंड के मनोवैज्ञानिक एड विंगरहोएट्स की रोने पर जो रिसर्च है उससे पता चलता है कि स्त्री और पुरुष के बीच रोने का फ़र्क बचपन से ही विकसित हो जाता है। नवजात शिशु लड़का हो या फिर लड़की, वह मात्र अपने पैरेंट्स का ध्यान आकर्षिक करने के लिए रोता है।
किसी के भी रोने पर उसके सामाजिक परिवेश का बहुत असर पड़ता है। जिन देशों में रोने से जुड़ी कोई ग़लत धारणाएँ नहीं हैं वहाँ के लोग अधिक रो लेते हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर जिन देशों में रोने को बुरा समझा जाता है, वहाँ के लोग अपने रुदन को दबा लेते हैं। विंगरहोएट्स की रिसर्च में एक रोचक तथ्य यह भी है कि अमीर देशों में लोग अधिक रोते हैं।
विंगरहोएट्स बताते हैं कि टेस्टोस्टेरोन नामक हार्मोन का हमारे रोने से गहरा संबंध है और अगर यह हार्मोन कम बने तो हम अधिक रोते हैं। यही कारण है कि प्रोस्टेट कैंसर के मरीज़ की आंखों से आंसू बहने लगते हैं या वो जल्दी जल्दी रोते हैं।
संवेदनाएँ हमें आंखों में आंसू लाने में बड़ी भूमिका अदा करती हैं। कभी आप दुख के कारण रो पड़ते हैं तो कभी ख़ुशख़बरी सुनकर आंखें छलक उठती हैं। लेकिन आंखों से आंसू बहने का कारण क्या है, यह अभी भी रहस्य बना हुआ है।
मान्यता है कि सामाजिकरण की प्रक्रिया में हम किसी के सामने रोकर अपने दिल के हाल सुनाते हैं, लेकिन इस पर अभी तक कोई सहमति नहीं बन सकी है।
डॉक्टर और वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर किसी व्यक्ति को बड़ा दुख हो तो वह रोने से कम हो जाता है, दिल के दबे हुए जज़्बात बाहर निकल जाते हैं, मन की कुंठा कम हो जाती है, इसलिए सदमे के बाद मरीज़ को दिल हल्का करने के लिए रोने की सलाह दी जाती है।
विंगरहोएट्स एक अन्य परीक्षण में कुछ चयनित लोगों को एक इमोशनल फ़िल्म देखने को कहा गया। फ़िल्म देखते समय कुछ लोगों की आंखों से आंसू बहने लगे और कुछ स्थिर रहे। फ़िल्म ख़त्म होने बाद उनसे एक फ़ॉर्म भरने को कहा गया, जिसका परिणाम आश्चर्यचकित कर देने वाला था। जो लोग फ़िल्म देखते समय नहीं रोए उनकी मानसिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं देखा गया, जबकि रोने वाले लोग फ़िल्म देखने के बाद काफ़ी अच्छा महसूस कर रहे थे।
मुझे यह कहने में को आपत्ति नहीं है कि रोना अभी भी एक रहस्य है। इस पर लगातार शोध किए जा रहे हैं। रोना है तो रोइए और अपना दिल हल्का कीजिए।

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