आज हम एक ज्वलंत मुद्दे पर बात करने जा रहे हैं। हमारे आस पास कई घटनाएं घटित हो रही हैं, जिन्हें देखकर मैं बेहद हैरान और परेशान सी हूँ। जो माँ-बाप हमें दुनिया में लाये हैं, क्या उनका हम पर कोई अधिकार नहीं है? जब उनकी उम्र ढल जाती है, तो बच्चे जवानी के मज़े लूटने के लिए उन्हें किनारे कर देते हैं। उनके बुढ़ापे का सम्मान ज़रा भी नहीं करते हैं। कभी कभी तो उन्हें ओल्ड एज होम तक भेज देते हैं। क्या बुढ़ापा कोई गुनाह है?

जितनी मेहनत से एक जोड़ा अपनी दुनिया बसाता है, उसे प्यार से सजाता है। उसका सच जानना मात्र उस अनुभव गुज़रने के बाद ही सम्भावना है। जब ज़िंदगी में एक जीवन साथी का आगमन होता है, तो दिल बेहद रोमांचित हो उठता है। लेकिन कुछ समय बाद ही इस प्यारी सी दुनिया में एक छोटे से मेहमान की किलकारियों का आरमान जाग उठता है। उसके आगमन के न जाने कितने सपने सजोने लगता है। आज जो माँ बाप का हाथ थामकर चलना सीखते हैं, कल जब वो बड़े होते हैं और जब उन्हें अपने बच्चों के साथ और सहारे की ज़रूरत होती है, तो वो सिर्फ़ अपनी ख़ुशियाँ देखने लगते हैं। उनके तज़रिबे और बुढ़ापे का सम्मान करने की जगह अपने माँ बाप को अकेला छोड़ देते हैं।

बुढ़ापे का सम्मान करने के कारण

बुढ़ापे का सम्मान ज़रूरी है

सोच बदलने की ज़रूरत है

हम आज जो करते हैं उसका ही परिणाम हमारे सामने प्रतिफलित होता है। आज भी कई परिवार हैं जिनमें बेटे को ही हमारे बुढ़ापे का सहारा और बेटियों को पराया धन माना जाता है। ऐसा प्रचलन इसलिए है क्योंकि विवाह करके वे अपने ससुराल चली जाती हैं और बेटे शादी करके बहू घर लाते हैं। इसी सोच के कारण ही बड़े होने पर बेटा चाहे प्रताड़ित करे, बुढ़ापे का सम्मान न करे या उन्हें घर से बाहर निकाल दे। लेकिन बेटों के ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी कारवाही नहीं करते हैं। बुढ़ापे में जब बेटे के साथ और सहारे की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, तब बेटा अपने बूढ़े माता पिता को अपने घर से बाहर निकाल देता है। यही कारण है कि वृद्धावस्था में लोग अकेलेपन के सबसे ज़्यादा शिकार हो रहे हैं।

अनुभव का सम्मान न करना

माँ बाप बच्चों की हर छोटी से छोटी ख़ुशियों का ध्यान रखते हैं और उन्हें अपने जीवन में महत्व देते हैं। लेकिन जब बच्चे बड़े होते हैं तो वो उनकी सुध लेना ही भूल जाते हैं। जैसे अगर उन्हें कोई टी०वी० या अन्य कोई सामान ख़रीदना हो तो माता पिता से सलाह लेना उन्हें याद नहीं रहता, क्योंकि वे उनके अनुभव को व्यर्थ समझते हैं।

बच्चे बाहर सड़क पर तो पड़ोसियों को नमस्ते कहते हैं, लेकिन घर के अपने माता पिता को सम्मान व समय देने में झिझक महसूस करते हैं। जबकि कुछ तो ऐसा करना ज़रूरी नहीं समझते हैं, उन्हें लगता है कि इससे क्या फ़ायदा होगा? शायद बच्चे स्वयं को सक्षम और समर्थ समझते हैं। उन्हें लगने लगता है कि अपनी देख रेख कर रहे हैं। उन्हें वह वक़्त याद नहीं रहता जिसके बिना आज की कल्पना भी सम्भव नहीं हो सकती थी। उन्हें उन बातों का आभास बुढ़ापे की अवस्था में आकर ही होता है। तब जाकर वे बुढ़ापे में सम्मान न मिलने का कष्ट समझ पाते हैं।

जो करते हैं, वो भरते हैं

अक्सर समाज में अनेक उदाहरण सामने आते हैं कि आज हम जो बर्ताव अपने माँ-बात के साथ करते हैं, आगे चलकर वही बर्ताव हमारे साथ हमारे बच्चे भी करते हैं। बच्चे हमसे देखकर ही जाने अंजाने सबकुछ सीखते हैं। अगर आज पर कुटिल और स्वार्थी बनेंगे और सिर्फ़ अपने बारे में सोचेंगे, तो निश्चित है कि आपके अपने बच्चे भी आपसे यही सीखेंगे और बुढ़ापे को गुनाह समझकर आपको अकेला छोड़ जायेंगे या फिर आपको ओल्ड एज होम भेज देंगे। इसलिए सेवा का मेवा खाने का विचार कर लीजिए। अपमान कि बजाय बुढ़ापे का सम्मान करना सीख लेना चाहिए।

हमारी पूरी टीम की तरफ से आप सब से यह विनम्र अनुरोध है कि आप अपने माता पिता को पूरा मान सम्मान करें और उनको सहारा दें। उनके कारण हम आज समर्थ और क़ाबिल बनकर उत्तम जीवन यापन कर कर पा रहे हैं। बुढ़ापे में माता पिता को जब आपके साथ, प्यार औ सहारे की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है तो उनके साथ रहकर उनकी देखभाल कीजिए।